Winston Churchill Biography In Hindi

20th सेंचुरी में दुनिया ने जब दो वर्ल्ड वार का विद्रोह झेला और दुनिया के सामने या तो ख़त्म हो जाने या फिर डिक्टेटरशिप का दौर आने की मुसीबत सामने आकर खड़ी हो गयी ।ख़ासतौर पर सेकंड वर्ल्ड वॉर के टाइम Hitler और Musolini के ग़लत इरादे दुनिया पर कब्ज़ा करने की सोच रहे थे तभी जिन डिप्लोमैटिस्ट ने इन डिक्टेटर का जी-जान से सामना किया, उनमें से Winston Churchill का नाम सबसे ऊपर आता है, अगर Winston नहीं होते तो हम आज किसी न किसी डिक्टेटर के अंडर में एक ग़ुलाम की तरह जी रहे होते या फिर कई देशों का पूरी तरह से अंत हो चुका होता ।

Winston Churchill का जन्म 30 नवंबर 1874 को Blenheim _ Palace, Woodstock में एक सक्सेसफुल फ़ैमिली में हुआ | वो अपने सर्वेन्ट्स के बीच ही बड़े हुए और उनका ज़्यादातर बचपन बोर्डिंग स्कूल में बीता। Winston स्कूल में ज़्यादा इंटेलीजेंट स्टूडेंट नहीं थे और बहुत रिबेलियस स्टूडेंट थे लेकिन वो स्पोर्ट्स में काफ़ी अच्छे थे और स्कू के दौरान उन्होंने कैडेट कॉर्प्स जॉइन (छात्र सेना दल) किया। स्कूल छोड़ने के बाद Winston ऑफिस की ट्रेनिंग के लिए Sandhurst गए, ऑफिस बनने के बाद Winston मिलिट्री ट्रैगिन के लिए गए और उनकी माँ की हेल्प से वो नार्थ वेस्ट इंडिया में जॉब पर लग गए। 1899 में Winston ने अपनी मिलिट्री जॉब से रिज़ाइन कर दिया और एक युद्ध संवाददाता (War Correspondent) की जॉब जॉइन की और अफ्रीका चले गये।

अपने काम की वजह से वो अफ्रीका में काफ़ी फ़ेमस हुए, जिसके लिए उन्हें विक्टोरिया क्रॉस का सम्मान भी मिला । 1990 में Winston वापस UK आये और ओल्डहैम सिटी में मेंबर ऑफ पार्लियामेंट के कैंडिडेट के लिए चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें जीत मिली।1904 में Winston अपनी कंज़र्वेटिव पार्टी को छोड़कर लिबर्टी पार्टी में चले गए, जिसके लिए कई बार उनकी आलोचना भी हुई। लिबरल पार्टी में Winston ने पॉलिटिक्स फ़ील्ड में काफ़ी तरक्की की, जिसकी वजह से 1908 में उन्हें बोर्ड ऑफ़ ट्रेड का प्रेज़िडेंट चुना गया। बोर्ड ऑफ़ ट्रेड ब्रिटेन के ग़रीब लोगों के लिए बराबरी और उनके विकास के लिए फण्ड इन्वेस्ट करता था। 1911 में उनको फ़र्स्ट लार्ड ऑफ दी एडमिरेलटी बनाया गया जो फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर के दौरान उनकी पोस्ट थी ।

युद्ध के दौरान जब यूरोप पर दबाव आने लगा तब Winston सबसे मैन मेंबर थे जो यूरोप को वॉर में इन्वॉल्व होने पर दबाव बना रहे थे । 1914 कुछ में लोग युद्ध में यूरोप को इन्वॉल्व करने के लिए मना कर रहे थे, लेकिन Winston की युद्ध में इन्वॉल्व होने की इच्छा बहुत प्रबल थी ।उस दौरान Winston ने युद्ध के लिए टैंक बनाने के लिए भी काफ़ी फण्ड रेज़ किया, उनको लगता था कि उनकी बनाई गई प्लानिंग युद्ध में काफ़ी कामयाब साबित होगी, लेकिन वो एक तरीके से अनसक्सेसफुल साबित हुई।1915 में Winston ने अपने Dardanelles Campaign के तहत Turkey को वॉर से बाहर कर दिया लेकिन उससे भी उनको फ़ायदा नहीं हुआ और Winston ने अपनी लार्ड ऑफ़ दी एडमिरेलटी कि पोस्ट से रिज़ाइन दे दिया और वापस लंदन चले गए।

1917 में उन्हें युद्ध सामग्री (Munitions) का मिनिस्टर बनाया गया, वर्ल्ड वॉर 1st खत्म होने का बाद उन्होंने रसियन आर्मी को सपोर्ट किया, जो सोवियत यूनियन पर कब्ज़ा कर चुके लोगों का विरोध कर रहे थे, 1924 मैं Winston को PM Baldwin द्वारा Chancellor चुनागया। सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया तब ब्रिटेन में हड़कंप मच गई और उस टाइम ब्रिटेन के PM को दबाव में आकर Winston को वापस फ़र्स्ट लार्ड ऑफ दी एडमिरेलटी का पद देना पड़ा, जो फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर के टाइम उनके पास था । फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर के टाइम उन्हें किसी कार्यवाही की वजह से इसी पद से हटाया गया था।

Winston ने बहुत पहले ही कह दिया था कि Hitler से पूरी दुनिया को खतरा है और 1939 में पोलैंड पर हमला होने के बाद उनका ये दावा सच साबित हो गया और फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर में Winston की असफ़लताओं को भुला दिया गया और युद्ध की कमान 64 साल के Winston को दे दी गयी। दुनिया भर में फैले ब्रिटिश लोग में ‘विन्नी इज़ बैक’ की खबर फ़ैल गयी और पूरी ब्रिटिश पार्लियामेंट में ऐसा कोई नहीं था जो जर्मनी के बारे में इतनी जानकारी रखता था, जितनी Winston को थी और जो Hitler के ऊपर काबू पा सकते थे। अगर Winston नहीं होते तो इंग्लैंड जर्मनी से युद्ध में हार जाता और उस टाइम उन्हें वॉर टाइम PM का दर्जा दिया गया क्योंकि अगर वो Hitler को हराकर उस पर काबू नहीं पाते तो आज Hitler की तानाशाही ने पूरी दुनिया को परेशान करके रखा होता । सेकंड वर्ल्ड वॉर जीतने के बाद Winston ने लेबर पार्टी की तरफ़ से PM के लिए इलेक्शन लड़ा जिसमें वो हार गए, इसके बाद वो फिर से ओपोज़िशन में चले गए और फ़ाइनली 1951 में वो PM का इलेक्शन जीत गए और इंग्लैंड के PM बन गए। Winston को 1954 में लिटरेचर में में नोबेल प्राइज़ से सम्मानित किया गया, 24 जनव 1965 को 90 जाल की उम्र में Winston की उनके घर मे डेथ हो गयी, उनका अंतिम संस्कार उस टाइम का सबसे बड़ा अंतिम संस्कार था ।

“Success is not final, failure is not fatal: it is the courage to continue that counts.”- Winston Churchill

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